इस सप्ताह का मानक


आई एस 18698 : 2026

डाइमेथाइल ईथर (डीएमई) मिश्रित तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) — विशिष्टि (पहला पुनरीक्षण)

भारत में तरलीकृत पेट्रोलियम गैस अर्थात एलपीजी का उपयोग घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्रों में ऊर्जा की आवश्यकता पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। देश में एलपीजी की खपत निरंतर बढ़ रही है, इसलिए इसके आंशिक विकल्प के रूप में डाइमेथाइल ईथर जैसे वैकल्पिक ईंधन का उपयोग आवश्यक हो गया है। डाइमेथाइल ईथर एक रंगहीन गैस है जिसमें ऑक्सीजन होती है और इसे बायोमास, कोयला, मेथेनॉल अथवा प्राकृतिक गैस के गैसीकरण से संश्लेषित किया जाता है।

आई एस 18698 : 2026 इस मानक का पहला पुनरीक्षण है, जो मूलतः वर्ष 2024 में प्रकाशित हुआ था। इस पुनरीक्षण में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह किया गया है कि बेंगलुरु स्थित एलपीजी उपकरण अनुसंधान केंद्र के वर्ष 2025 के शोध प्रतिवेदन के आधार पर डीएमई की अधिकतम मात्रा बीस प्रतिशत से घटाकर आठ प्रतिशत भार अनुपात कर दी गई है। यह निर्णय एलपीजी वितरण श्रृंखला में उपयोग होने वाले इलास्टोमर की विभिन्न डीएमई-एलपीजी मिश्रणों के साथ अनुकूलता के अध्ययन पर आधारित है।

यह भारतीय मानक घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक उपयोग के लिए डीएमई मिश्रित एलपीजी की आवश्यकताएँ, नमूना लेने की विधियाँ और परीक्षण प्रक्रियाएँ निर्धारित करता है। वाहन ईंधन के रूप में इसका उपयोग इस मानक के दायरे से बाहर है। एलपीजी को IS 4576 और डीएमई को IS 16704 का पालन करना अनिवार्य है।

गुणवत्ता मापदंडों में पंद्रह डिग्री सेल्सियस पर घनत्व, चालीस डिग्री सेल्सियस पर अधिकतम एक हजार पचास किलोपास्कल वाष्प दाब, कुल वाष्पशील सल्फर की अधिकतम मात्रा एक सौ चालीस मिलीग्राम प्रति किलोग्राम, तांबा पट्टी संक्षारण परीक्षण, हाइड्रोजन सल्फाइड की अनुपस्थिति और मुक्त जल की शून्य मात्रा शामिल हैं। गैस रिसाव की पहचान के लिए उत्पाद में न्यूनतम मात्रा में गंधक यौगिक मिलाना अनिवार्य है। सिलेंडरों पर ज्वलनशील पदार्थ का चेतावनी लेबल लगाना भी आवश्यक किया गया है।

Last Updated on जून 1, 2026

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